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	<description>Antarvasna Hindi Sex Story</description>
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		<title>खेल वही भूमिका नयी-6</title>
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		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Oct 2025 11:49:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Group Sex Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Call Girl]]></category>
		<category><![CDATA[Garam Kahani]]></category>
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					<description><![CDATA[कामुकता से भरपूर इस सेक्स कहानी के पांचवें भाग खेल वही भूमिका नयी-5 में अब तक आपने पढ़ा था कि मेरी सहेली के पति ने मुझे रात तीन बजे तक रौंदा था, जिस वजह से मुझे बड़ी थकान हो गई थी. सुबह उठ कर मैं नहायी तो रमा ने मुझे तैयार होने के लिए कुछ <a title="खेल वही भूमिका नयी-6" class="read-more" href="https://kahani18.com/group-sex-stories/khel-vahi-bhumika-nayi-part-6/" aria-label="Continue reading खेल वही भूमिका नयी-6">पूरी कहानी पढ़ें</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>कामुकता से भरपूर इस सेक्स कहानी के पांचवें भाग<br />
खेल वही भूमिका नयी-5<br />
में अब तक आपने पढ़ा था कि मेरी सहेली के पति ने मुझे रात तीन बजे तक रौंदा था, जिस वजह से मुझे बड़ी थकान हो गई थी. सुबह उठ कर मैं नहायी तो रमा ने मुझे तैयार होने के लिए कुछ मॉडर्न कपड़े दिए. मगर मैंने साड़ी पहनना ही थी समझा.<br />
अब आगे:</p>
<p>मेरी सहेली रमा बोली- सच में सारिका मैं ही गलत थी, आज जब भेद खुलेगा तो सच में लोग चौंक जाएंगे.<br />
जब हम दोनों तैयार हो गए, तो हम बिस्तर के पास आगे की योजना के बारे में बात करने के लिए चले आए.</p>
<p>वहां पहुंच जब रमा ने बिस्तर देखा, तो चकित होते हुए बहुत जोरों से हंसती हुई बोली- सारिका ये क्या है, रात की कहानी तो ये चादर बता रही है.<br />
मुझे थोड़ी शर्मिंदगी सी महसूस हुई. </p>
<p>पर रमा ने बोला- लगता है कान्ति ने तुम्हें पूरी तरह निचोड़ कर रख दिया. मैं यकीन से कह सकती हूं तुम्हें बहुत मजा आया होगा. खैर … अभी कमरे सफाई के लिए आएंगे, हम दोनों नीचे चलते हैं.<br />
रमा की बात तो सही ही थी कि कांतिलाल ने मुझे निचोड़ कर रख दिया था, पर आनन्द भी उतना ही आया था. </p>
<p>मैं उसके साथ शर्माती हुई चल पड़ी. दोपहर का समय तो हो ही चुका था, पर अभी तक किसी का अता-पता नहीं था. केवल मैं और रमा ही थे. हम दोनों एक केबिन वाले स्विमिंग पूल के सामने कमरे में चले गए और खाने का आर्डर दे दिया.</p>
<p>वहां का नज़ारा ही अलग था. एक पल तो मुझे लगा कि यहां आए सभी लोग हमारी तरह ही मजे करने आए हैं. क्योंकि जितने भी मर्द और औरतें पूल के आसपास थे, सभी आधे नंगे ही थे. औरतें केवल ब्रा और पैंटी में … और मर्द केवल जांघिया या हाफ पैंट में थे.</p>
<p>पर जब ध्यान दिया तो कुछ लोग परिवार के साथ भी थे. तब मुझे धीरे धीरे समझ आया कि ये लोग अच्छे खासे खुले और ऊंचे वर्ग के लोग हैं. हमारी तरह रूढ़िवादी सोच के नहीं हैं.</p>
<p>खैर … जो भी हो … मुझे यहां अच्छा लग रहा था क्योंकि मैं जैसा जीवन चाहती थी वैसा ही सब दिख रहा था. फर्क ये था कि इस तरह की जीवन शैली हम जैसे सामान्य वर्ग के लोगों के लिए संभव नहीं होती है.</p>
<p>हम दोनों सहेलियाँ खाने के साथ अब आगे की योजना पर बात करने लगी. रमा ने बताया कि आज और कल यानि 31 दिसंबर और 1 जनवरी को सब लोग बहुत मजे करने वाले हैं. हर कोई अपनी अपनी सोच सामने रखेगा, देखा जाएगा कि किसकी तरकीब सबसे बढ़िया है. उसने बताया कि शाम तक बाकी लोगों की बीवियां भी आ जाएंगी और फिर एक अलग कमरे में हमारा नया साल मनाने का बंदोबस्त हो चुका है. </p>
<p>फिर उसने मुझसे कहा कि मैं अभी कुछ देर कमरे में आराम कर लूं, फिर जब वो मुझे बुलाएगी, तब बताए हुए कमरे में जाना.<br />
हम खाना खाने के बाद इधर उधर टहलने के बाद कमरे में वापस चले गए. मैं रात की थकान के वजह से सोफे पे ही बैठे बैठे सो गई. रमा ने मुझे परेशान नहीं किया और सोने दिया.</p>
<p>शाम करीब 6 बजे मेरी नींद खुली, तो मैं कमरे में अकेली थी. मुँह हाथ धोकर मैं फिर से उसी साफ सुथरी घरेलू महिला के रूप में आ गई. मुझे तो पहले से पता था कि आज की रात क्या होने वाला है, सो मैं बस इन्तजार में थी.</p>
<p>करीब 7 बजे मुझे रमा का फ़ोन आया. उसने मुझे बताए हुए कमरे में आने को कहा. मैं उस कमरे की तरफ बढ़ने लगी. पर पता नहीं क्यों मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा. </p>
<p>मुझे अंदेशा हो रहा था कि आज कुछ अलग होने को है, बाकी ऐसा तो कुछ नहीं था जो कि मैं पहली बार करने जा रही थी. शायद मुझे उन 3 औरतों की फिक्र थी, जिनसें मैं पहले कभी नहीं मिली थी. पर अब जो होना था, सो होना था. यही सोच कर मैं कमरे तक पहुंच गई.</p>
<p>दरवाजे की घंटी बजाई, तो रमा ने दरवाजा खोला और मुझे पकड़ कर भीतर ले जाते हुए सभी से मुखातिब होते हुए जोर से बोली- फ्रेंड्स ये है आज का तोहफा मेरी तरफ से … ये है मेरी सबसे खास सहेली सारिका.</p>
<p>उधर मौजूद रवि, राजशेखर और कमलनाथ आंख फाड़े देखते रह गए.<br />
तभी राजशेखर बोल पड़ा- क्या यही सारिका है तुम्हारी सहेली?<br />
रमा ने हंसते हुए जवाब दिया- जी हां चौंक गए न … मेरी इस तरकीब से सब … यही है वो सहेली, जिसका आप सब बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे.</p>
<p>रमा ने बाकी के 3 औरतों को संबोधित करते हुए कहा- तुम सब ये नहीं जानना चाहती हो कि तुम तीनों के पतियों के चेहरे ऐसे क्यों हो गए?<br />
इस पर एक महिला ने कहा- हां बताओ … इन सब के चेहरे देख मैं भी सोच में पड़ गई थी कि ऐसा क्या अनोखा हुआ. हम सबको पता था कि सारिका यहां आने वाली है.</p>
<p>तब तक दूसरी महिला ने पूछा- क्या आप सब सारिका को पहले से जानते हो?<br />
तब कांतिलाल ने उत्तर दिया- हां कल रात से तीनों सारिका को अच्छे से पहचान चुके हैं.</p>
<p>तभी रवि ने बोला- रमा जब तुम जानती थी, तो इतना नाटक क्यों किया?<br />
रमा बोली- अरे यार थोड़ी बहुत मौज मस्ती और क्या … मैं सबको चौंकाना चाहती थी.</p>
<p>इस पर कमलनाथ ने कहा- वो तो ठीक है रमा … पर तुम अपनी सहेली को उस चूतिये नेता के साथ क्यों सोने दिया?<br />
रमा बोली- नहीं करती तो तुम सबको बेवकूफ कैसे बनाती और फिर क्या हुआ … कौन सा उस गधे नेता ने कुछ लूट लिया. वो तो जिस्म का भूखा था, सो चला गया. और फिर तुमने भी तो अपनी बीवी के साथ उसे सोने दिया था न … क्या फर्क पड़ता है … ऐसे छोटे मोटे लोगों से. हम सब के मन के साथ उसने थोड़े छेड़खानी की, हम सब आज भी एक दूसरे के साथ हैं और सबकी भावनाएं समझते हैं, सबको सम्मान देते हैं.</p>
<p>इस पर तीसरी महिला ने रमा का समर्थन करते हुए बोला- हां, रमा सही कह रही है, हमारे लिए सेक्स इतनी भी बड़ी चीज नहीं, सेक्स को तो हम अगले पायदान तक ले जाते हैं. जरूरी हम सब का साथ है. एक समान विचार और काम काज से थोड़ा दूर अपने लिए समय निकालना.</p>
<p>उसके बाद वे सब बीती रात की घटना के बारे में पूछने लगी. तब जाकर रमा ने सबको पिछली रात की घटना को बताया. उन तीनों मर्दों को बेवकूफ समझ कर सभी महिलाएं हंसने लगीं.</p>
<p>इस तरह की जीवन शैली में ढलने की वजह से किसी को अचरज इस बात से बिल्कुल भी नहीं हुआ था, न ही किसी में इस बात से नाराजगी थी कि उन लोगों ने मेरे साथ संभोग किया. बल्कि इस रोचक खेल के लाने से रमा की उल्टे तारीफ ही हुई. मेरी अभिनय की भी तारीफ़ हुई कि अब तक उनको पता नहीं चलने दिया कि मैं एक सामान्य महिला हूँ, कोई वेश्या नहीं.</p>
<p>फिर हमारे एक साथ होने की बहुत देर बहस छिड़ी रही. मुझे एक हद तक उनकी बातें सही लगीं, क्योंकि यहां कोई किसी के साथ जोर जबरदस्ती नहीं कर रहा था. सबको एक दूसरे की भावनाओं की फिक्र थी. संभोग न केवल शारीरिक संतुष्टि के मार्ग था … बल्कि मानसिक तनाव से भी दूर करने का साधन था.</p>
<p>मैं तो घरेलू महिला थी, केवल घर के काम देखती थी. पर वे सभी मर्दों के साथ परस्पर उनके कामों में हाथ बंटाती थीं. काम के बोझ से सच में तनाव पैदा होता ही है, सो एक अलग समय निकाल अगर कुछ मौज मस्ती कर ली जाए और किसी को कोई परेशानी न हो, तो क्या गलत है.</p>
<p>अब मैं बाकी की 3 महिलाओं का परिचय करवाती हूँ. जिस तरह रमा ने सबसे मेरा परिचय करवाया था. </p>
<p>पहली महिला निर्मला थी, जो कमलनाथ की पत्नी थी. वो करीब 45-46 की उम्र होगी, उसका कद 5 फुट का रहा होगा. रंग गोरा और शरीर भारी भरकम, लगभग 38 साइज़ के स्तन और कूल्हे अंदाजन 44 के रहे होंगे. कुर्ती और पजामे में वो अच्छी दिख रही थी. वो एक सभ्य समझदार महिला लग रही थी.</p>
<p>वही दूसरी महिला राजेश्वरी, राजशेखर की पत्नी थी और वो भी लगभग निर्मला से मिलती जुलती ही थी. उसकी उम्र भी उसी के आस पास होगी. वो साड़ी पहने हुई थी और वो भी एक सभ्य महिला की भांति दिख रही थी.</p>
<p>तीसरी महिला कविता थी, जो हम सब में से सबसे कम उम्र की थी. वो करीब 35-36 की थी और वो जीन्स और शर्ट पहने हुए थी. उसका बदन भरा भरा था और उस शर्ट में उसके सुडौल स्तन और जीन्स में उसके चूतड़ काफी बड़े दिख रहे थे. वो भी बहुत गोरी थी और हम सबमें से वही एक ज्यादा मॉडर्न दिख रही थी.</p>
<p>यहां मैं बता दूं कि कविता रवि की दूसरी पत्नी थी और उम्र में रवि से बहुत छोटी थी. दोनों ने प्रेम विवाह किया था. ये शादी रवि के तलाक होने के बाद हुई थी. उनका प्रेम प्रसंग पहले से था, शादी से पहले कविता कुंवारी थी और रवि शादीशुदा था. दोनों एक साथ काम करते थे, फिर शादी के बाद खुद का व्यापार शुरू किया.</p>
<p>अब आगे की कहानी बताती हूँ. शाम 8 बजे तक हम सब एक दूसरे से अच्छे से परिचित हो चुके थे. वेटर से सभी खाने पीने और जितनी भी जरूरत की चीज़ें चाहिए थीं, हमने मंगवा कर रख लीं और उन्हें कहलवा दिया कि हमें अब कोई परेशान करने न आए. हम सब नए साल के स्वागत में अपना समय बिताएंगे.</p>
<p>वहां सभी मदिरा पीने वाले थे, पर मैंने आज तक कभी मदिरा को चखा भी नहीं था. मुझे कविता ने छोटी सी बोतल में कुछ दिया और कहा कि शराब नहीं पी सकती, तो कम से कम फ्रूटबियर तो पियो.<br />
मैं तो जानती भी नहीं थी कि बियर क्या होती है … पर फ्रूट सुनकर समझी के फल का रस होगा. मुझे पीने में भी अच्छा लगा, जैसे अनानास का रस पी रही हूँ.</p>
<p>हम सब खाते पीते 12 बजने का इंतजार करने लगे.</p>
<p>तभी कविता ने कहा- चलो अब सारे मर्द एक तरफ हो जाएं और पार्टी के लिए अपने पसंद के कपड़े बदल लें.<br />
सारे मर्द दूसरे कमरे में चले गए और कविता ने दरवाजा बंद कर दिया.</p>
<p>वो हम सभी से कहने लगी- आप सबको मैं जो कपड़े दूंगी, वही पहनना होगा. आज ये सारे मर्द हमें देख कर पागल हो जाएंगे. कविता ने एक बैग निकाला और उसमें से एक ही तरह के 5 जोड़े कपड़े निकाले. </p>
<p>उन कपड़ों को देख राजेश्वरी बहुत खुश हुई और बोली- यार, मैंने भी यही कपड़े आज के रात पहनने की सोची थी.</p>
<p>कविता- तो फिर सोच क्या रही हो … फटाफट पहन लो … इलास्टिक वाले हैं सबको फिट हो जाएंगे … कोई भी लूज़ तो नहीं होगी पक्का … पर टाइट हो सकती हैं. ही..ही..ही..<br />
राजेश्वरी- टाइट देख कर तो हमारे मर्दों का और भी टाइट हो जाएगा … हा हा हा..</p>
<p>कविता और राजेश्वरी ने फटाफट कपड़े अपने उतारे और हमारे सामने ब्रा और पैंटी में खड़ी होकर हमें कहने लगीं- आप सबको क्या न्यौता भेजना होगा, तब पहनोगी. जल्दी करो पार्टी करनी है.</p>
<p>मैंने देखा कविता और राजेश्वरी ने मैचिंग की ब्रा पैंटी पहनी थी और वो दोनों तो उसी में ज्यादा आकर्षक और कामुक दिख रही थीं.<br />
जब कविता ने अपने कपड़े पहने, तो मैं हैरान हो गई. ये किसी स्कूल की यूनिफार्म थी. शर्ट इतनी कसी थी कि स्तन लग रहे थे, बटन तोड़कर बाहर निकल आएंगे. उसकी स्कर्ट इतनी छोटी थी कि सिर्फ चूतड़ ढके दिख रहे थे.</p>
<p>वो जब तैयार होकर सामने बैठी, तो उसकी पैंटी तो साफ दिख रही थी.</p>
<p>यही हाल राजेश्वरी का था. उसके बाद रमा ने मुझे कपड़े दिए और खुद भी पहन लिए.</p>
<p>निर्मला ने पहना और चिड़चिड़ाने लगी और बोली- इसे पहनने से तो अच्छा है कि मैं नंगी ही रह जाऊं और वैसे भी वो लोग हमें नंगी कर ही देंगे तो पहनने का क्या फायदा.<br />
इस पर रमा ने उसे समझाया कि ये बस पार्टी के लिए है. तुम्हारे मन में भी कोई विचार हो तो बताओ.</p>
<p>निर्मला ने रूखे मन से कहा- ठीक है.<br />
वो मुझसे बोलने लगी- तुम क्यों नहीं पहन रही हो?</p>
<p>वैसे निर्मला इन कपड़ों में थोड़ी थुलथुली दिख रही थी और स्कर्ट उसके लिए बहुत अधिक छोटा था, जिसके वजह से उसका आधे चूतड़ दिख रहे थे.</p>
<p>मैंने तो जीवन में कभी स्कूल जाते हुए ऐसे कपड़े नहीं पहने थे, सो मुझे और अधिक अटपटा लग रहा था.</p>
<p>जब मैंने उस परिधान को पहनने के लिए अपनी साड़ी, ब्लाउज और पेटीकोट उतारे … तो निर्मला बोली- बहुत गठीला बदन है तुम्हारा.<br />
मैंने उसे अपनी मुस्कुराहट से उसका धन्यवाद किया और वो कपड़े पहन लिए. सच में बहुत ही अजीब कपड़े थे, वो पर हम सब जवान लड़कियों की तरह दिख रहे थे … जैसे कि कोई अंग्रेज़ी फ़िल्म की लड़कियां हों.</p>
<p>हम सबकी जांघें और थोड़े चूतड़ तो दिख ही रहे थे. ऊपर की शर्ट तो ऐसे लग रही थी कि अभी ही सबकी फट जाएगी.</p>
<p>हम सब तैयार होकर हॉल में चले आए, तो देखा चारों मर्द पहले से तैयार होकर बैठे थे. उनका हुलिया तो हम सबसे भी ज्यादा हंसाने वाला था. सबने पतली डोरी की जांघिया को पहन रखा था और गले में केवल टाई थी.<br />
हम सब उन्हें देखकर जहां हंसने लगी थी, वहीं वो लोग हमें देख अचंभित होने के साथ कामुक भी होने लगे थे.</p>
<p>सब लोग हमें बारी बारी ललचाई नजरों से निहार रहे थे.</p>
<p>तभी कमलनाथ ने कहा- आज का खेल मैं शुरू करूंगा. </p>
<p>वो भीतर से 5 प्लास्टिक के छोटे छोटे गमले लाया, जिनमें रेत भरी हुई थी. </p>
<p>उसने वो गमले हम पाँचों महिलाओं के हाथ में देकर कहा- तो आज का खेल ये है कि सभी महिलाएं अपने अपने गमलों के ऊपर करीब आधे फुट ऊंचाई से बैठ पेशाब करेंगी, उसके बाद इस खेल का राज खोला जाएगा.</p>
<p>मुझे बड़ा अजीब लगा … पर बाकी की महिलाएं उत्सुक दिखीं और आपस में बातें कानाफूसी करते हुए पेशाब करने की तैयारी करने लगीं.</p>
<p>सबने पहले ही बहुत पानी मदिरा और ठंडा पिया था, इस वजह से हम सबको ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ रही थी. हम सबने अपनी अपनी पैंटी घुटनों तक सरकाया और एक कतार में गमलों के ऊपर बैठ गए. </p>
<p>हम सब जब पेशाब करने जा रही थी तो कमलनाथ ने कहा- सबका पेशाब एक धार में होना चाहिए और रेत के बीच में एक ही जगह गिरना चाहिए, इधर उधर धार नहीं जाना चाहिए.</p>
<p>हम सब उसके दिशा निर्देश अनुसार पेशाब करने लगी और 2-3 मिनट में सब उठकर फिर अपनी अपनी पैंटी पहन सोफे पे आ गई.<br />
अब वो राज जानने की जिज्ञासा सब में थी, जिसके वजह से हमने ये सब किया था.</p>
<p>कमलनाथ ने एक मापने के लिए एक स्केल ली और हर एक गमले में उसे डालकर कुछ नापने लगा.</p>
<p>थोड़ी देर के बाद उसने हम सबके लिए एक परिणाम घोषित किया.</p>
<p>उसने बताया- राजेश्वरी 0.80 इंच, सारिका 0.86 इंच, रमा 0.90 इंच, निर्मला 0.77इंच … और अंत में कविता 1.75 इंच. </p>
<p>हम सब उसके कहने का मतलब नहीं समझ पा रहे थे. इस वजह सबने उससे मतलब पूछना शुरू कर दिया. तब उसने बताया कि ये गहराई वो है, जो रेत में पेशाब की तेज धार से बनी है.</p>
<p>हम सबने पूछा कि उससे क्या पता चलता है.<br />
तब उसने बताया कि इससे ये पता चलता है कि किस औरत में ज्यादा दम है.<br />
उस पर निर्मला ने पूछा- वो कैसे?<br />
तो उसने बताया कि जिसकी योनि की नसें और मांसपेशियां अधिक ताकतवर होती हैं, वो ज्यादा दबाव से पेशाब कर सकती है और रेत में ज्यादा गहरी छाप बना सकती है.</p>
<p>उसका सीधे सीधे ये कहना था कि हम पाँचों में कविता की योनि सबसे कसी हुई थी.</p>
<p>इस बात पर हम सबको बहुत बुरा लगा कि इस तरह का भेदभाव क्यों पैदा करना, जब सब एक मन से यहां आए हुए हैं. सब क्रोधित भी होने लगे, पर कमलनाथ ने सब से माफी मांगते हुए इसे एक तरह का केवल खेल बता कर स्थिति नियंत्रित कर ली. </p>
<p>वैसे जो भी हो हम सभी महिलाओं में कविता ही सबसे कम उम्र की थी, तो स्वाभाविक है कि उसकी नसें और मांसपेशियां हम बाकी की महिलाओं से थोड़ी ज्यादा मजबूत और सख्त होंगी ही.</p>
<p>अभी 9:30 बज चुके थे और अब खेल का दूसरा पड़ाव सामने आया.</p>
<p>कविता ने पिछले खेल का तर्क देते हुए कहा कि यदि उसकी योनि सबसे ज्यादा कसी हुई है, तो उसी मर्द का लिंग भी इसमें आज की रात सबसे पहले जाएगा, जो चारों में से ज्यादा ताकतवर होगा.</p>
<p>अब इसके बाद बाकी के मर्द ये सोच में पड़ गए कि कैसे अपनी अपनी योग्यता साबित करें.</p>
<p>थोड़ी देर चिंतन और मंथन के बाद एक नतीजे पे पहुंचा गया. पर जहां औरतों की बारी होती है, वहां तो परीक्षा लेने में औरतें आगे होती ही हैं. </p>
<p>मर्दों को दो पड़ाव पार करने की चुनौती दी गई. निर्मला जहां सबसे अधिक प्रौढ़ लग रही थी, वही उसका मन शैतानी से भी भरा हुआ था. उसने ही पहले पड़ाव का चयन किया.</p>
<p>निर्मला ने वहां रखी खाली बियर की बोतलों में पानी भर दिया और फिर उसे रस्सी से बांध दिया. अब सभी मर्दों को करना ये था कि उस बोतल को लिंग से बांध कर करीब 5 मिनट तक पूरे कमरे में घूमना था. </p>
<p>सभी अपनी अपनी जांघिया निकाल तैयार हो गए और फिर सबसे पहले रवि ने शुरूवात की. वो इस परीक्षा में पास हो गया.</p>
<p>इसके बाद कांतिलाल ने, जो कि पास हो गया. फिर राजशेखर ने और वो भी पास हो गया.<br />
पर अंत में जब कमलनाथ की बारी आई, तो वो अंतिम पल में हार मान गया. उससे बोतल का वजन सहा नहीं गया. शुरूआत उसने एक खेल से की थी मगर जब कमलनाथ की बारी आई … तो वो पहले ही चरण में विफल हो गया.</p>
<p>कमलनाथ के लिए परीक्षा समाप्त हो चुकी थी. अब बाकी के तीन मर्दों को अगली परीक्षा के लिए जाना था.</p>
<p>अब उन्हें ये काम दिया गया कि सभी मर्दों को अपना अपना लिंग उत्तेजित करना है और फिर उसी अवस्था में पेशाब करना है. जिस किसी का भी लिंग मूत्र निकलते हुए ढीला पड़ने लगेगा, वो हार जाएगा.</p>
<p>ये राजेश्वरी का दिमाग था. हम सब जानते थे कि ऐसा करना असंभव सा है. फिर भी हमने उन्हें ये काम दिया. सभी मर्द तैयार हो गए और इसमें हम महिलाएं उनका कोई साथ नहीं देने वाली थीं.</p>
<p>सबने खुद से अपना अपना लिंग हाथ से पकड़ हिलाना शुरू किया. हम सब जिस वेशवूषा में थे. उससे तो वे सारे मर्द पहले से ही थोड़े बहुत उत्तेजित थे ही, इस वजह से उन्हें लिंग कड़क करने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी.</p>
<p>फिर प्रतिस्पर्धा का खेल शुरू हुआ. तीनों ने बहुत जोर लगाया, पर किसी के लिए ऐसी अवस्था में पेशाब करना संभव नहीं था. जब जब किसी ने भी जोर लगाया, उसका लिंग स्थूल पड़ने लगता. </p>
<p>आधे घंटे तक प्रयास करने के बाद आखिरकार सबने हार मान ली और सब बैठ गए. </p>
<p>मेरी इस सेक्स कहानी पर आपके मेल आमंत्रित हैं.<br />
[email protected]<br />
कहानी का अगला भाग: खेल वही भूमिका नयी-7</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>खेल वही भूमिका नयी-3</title>
		<link>https://kahani18.com/xxx-kahani/khel-vahi-bhumika-nayi-part-3/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Sep 2025 06:39:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[XXX Kahani]]></category>
		<category><![CDATA[Call Girl]]></category>
		<category><![CDATA[Hot Sex Stories]]></category>
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					<description><![CDATA[अभी तक मेरी फ्री क्सक्सक्स कहानी के दूसरे भाग खेल वही भूमिका नयी-2 में आपने पढ़ा कि मैं नेता के साथ काल गर्ल बन कर सम्भोग कर चुकी थी. मुझे देख कर बाकी के मर्द भी गर्म हो उठे थे. नेता के जाने के बाद रमा के मित्रों ने मेरे साथ सम्भोग करना चाहा. इस <a title="खेल वही भूमिका नयी-3" class="read-more" href="https://kahani18.com/xxx-kahani/khel-vahi-bhumika-nayi-part-3/" aria-label="Continue reading खेल वही भूमिका नयी-3">पूरी कहानी पढ़ें</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>अभी तक मेरी फ्री क्सक्सक्स कहानी के दूसरे भाग<br />
खेल वही भूमिका नयी-2<br />
में आपने पढ़ा कि मैं नेता के साथ काल गर्ल बन कर सम्भोग कर चुकी थी. मुझे देख कर बाकी के मर्द भी गर्म हो उठे थे. नेता के जाने के बाद रमा के मित्रों ने मेरे साथ सम्भोग करना चाहा. इस पर रमा ने मुझे वेश्या के जैसे ही बने रहने को कहा और अभी राज को गुप्त रखने को कहा. मेरी मदमस्त जवानी से लट्टू होकर कमलनाथ मेरे साथ सम्भोग करने लगा था.<br />
अब आगे:</p>
<p>अब तक के संभोग में मेरे भीतर भी वासना की चिंगारी आग बन चुकी थी और मन में चरम सुख पाने की तीव्र इच्छा होने लगी थी. मैं जल्दी से उसकी गोद में बैठ कर लिंग को योनि में प्रवेश कराते हुए उसकी गोद में उछल उछल कर संभोग को आगे बढ़ाने लगी.</p>
<p>मैंने खुद को उसके कंधों को पकड़ कर खुद को सहारा दिया और अपने घुटने मोड़ कर ऐसे धक्के देने लगी कि उसका लिंग ज्यादा भीतर जाए.</p>
<p>कमलनाथ ने मेरे चूतड़ों को पकड़ लिया और मुझे धक्के लगाने में सहायता करने लगा. साथ ही बारी बारी मेरे स्तनों का दूध भी पीने लगा. उसे बहुत ज्यादा आनन्द आ रहा था और मुझे भी और मैं भूल ही गई थी कि कोई और भी हमें देख रहा है.</p>
<p>मुझे धक्के लगाते हुए अब 5 मिनट होने को चले थे. कमलनाथ के भी आव भाव बता रहे थे कि अब वो जल्द ही झड़ने वाला है.</p>
<p>जैसे जैसे धक्के बढ़ते जा रहे थे, हम दोनों सिसकारी भरते हुए तेज़ सांस लेने लगे थे. मैं इतनी तेज धक्के मारने लगी कि कमलनाथ समझ गया कि मैं भी झड़ने वाली हूँ. </p>
<p>एक औरत को झड़ते देख कर किसी भी मर्द को अपनी मर्दानगी पर गर्व होता है. यही सोच शायद उसकी उत्तेजना दुगुनी हो गई.</p>
<p>मैं बस और धक्के मारते हुए कमलनाथ से पूरी ताकत से चिपक गई और अपने चूतड़ उछाल उछाल कर ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ करते हुए झड़ने लगी. मुझे झड़ती देख कमलनाथ भी अपने पर काबू न रख सका और वो भी गुर्राते हुए मेरे चूतड़ पकड़ कर नीचे से झटके मारने लगा. कुछ ही पल में हम दोनों एक साथ झड़ने लगे.</p>
<p>एक तरफ जहां मैं पूरी ताकत लगा कर उसे धक्के मारते हुए अपनी योनि का रस उसके लिंग पर छोड़ने लगी, वहीं कमलनाथ भी नीचे से झटके देता हुआ मेरी योनि के भीतर अपने वीर्य की पिचकरी मारने लगा. मैं झड़कर उसकी गोद में ढीली होने लगी और कमलनाथ भी अपने हाथ छोड़ सोफे पे हांफता रहा.</p>
<p>हम दोनों एक बार के सम्भोग के बाद शांत पड़े थे.</p>
<p>तभी पीछे से रवि ने हाथ डालकर मुझे उठाना चाहा. जबकि मैं थक चुकी थी. पर रवि हमारा संभोग देख इतना ज्यादा उत्तेजित हो चुका था कि अब उससे सब्र नहीं हो रहा था. </p>
<p>उसने मुझे जबरदस्ती विनती करते हुए उठाकर सोफे पर झुका दिया और खुद मेरे पीछे आ गया.</p>
<p>मेरी योनि अभी भी वीर्य से लबालब भरी थी, तो रवि ने जल्दी से एक कपड़े से मेरी योनि से टपकते वीर्य को साफ किया और अपनी हवस मिटाने को तैयार हो गया.</p>
<p>वो इतना अधिक उत्तेजित था कि उसने एक बार भी मुझे लिंग चूसने को नहीं कहा. </p>
<p>तभी राजशेखर बोला- रमा अब बर्दाश्त नहीं होता … चलो हम भी बढ़ चलें.<br />
इस पर रमा बोली- अभी तो मुझे मेरे पति का भी प्रदर्शन देखना है. हम बाद में रात भर एन्जॉय करेंगे.</p>
<p>रमा की बात खत्म होते होते रवि ने अपना लिंग एक झटके में मेरी योनि में घुसा दिया. उसके लिंग का जोर इतना तेज था कि मैं अपनी कराह रोक नहीं पाई. रवि का लिंग मैंने देखा भी नहीं था, पर झटके के अंदाज से ये साफ हो गया था कि उसका आकार क्या है और ताकत कितनी अधिक है. मैं अभी भी थकान महसूस कर रही थी, मगर रवि ने मुझे पूरी ताकत से कमर से पकड़ लिया था. मैं अपने हाथ और सिर सोफे पर टिका कर अपना वजन संतुलित करने की कोशिश करने लगी. </p>
<p>रवि का लिंग मुझे थोड़ा मोटा तो लग रहा था और जिस प्रकार से उसने झटका मारा था, मुझे उसका सुपारा मेरी योनि को भरपूर खोलते हुए भीतर घुस गया था. </p>
<p>रवि इतना अधिक उत्तेजित था कि उस झटके के पल भर बाद ही वो तेज़ी से धक्के मारते हुए आगे बढ़ने लगा. मुझे ऐसा लग रहा था मानो ये कुछ ही पलों में झड़ जाएगा … पर मेरा अंदाज गलत था. वो भी कम अनुभवी नहीं था और कई सालों से संभोग क्रियायों में था. इसलिए इतनी जल्दी उसका भी स्खलन स्वभाविक नहीं था. ये तो उसकी उत्तेजना थी, जिसकी वजह से वो पूरे जोश से धक्के मार रहा था. </p>
<p>उसके दमदार धक्कों के कारण मैं खुद में इतनी कमजोरी महसूस करने लगी कि मेरे मुँह से रोने जैसी कराह निकलने लगी और जिस्म ढीला पड़ने लगा. </p>
<p>रवि एक खूंखार जानवर की तरह मुझमें धक्के मारे जा रहा था और बेरहमी से कभी मेरे चूतड़ों को, तो कभी नीचे से स्तनों को मसलता. उसके धक्के लगातार एक सांस में चल रहे थे और जब कभी उसे थकान लगती, तो लिंग मेरी योनि के भीतर दबा कर मेरे स्तनों, चूतड़ों और जांघों को सहलाकर मेरे बदन का आनन्द लेते हुए थोड़ा सुस्ता लेता. </p>
<p>उसकी इस तरह के संभोग क्रिया से मुझे लगने लगा कि रवि के आगे मैं देर तक नहीं टिक पाऊंगी.</p>
<p>उधर रमा ने ये भी बोल दिया था कि उसके पति का प्रदर्शन भी बाकी है. मतलब साफ था कि रवि के बाद कांतिलाल की बारी थी … और क्या पता कहीं राजशेखर भी उठ खड़ा हुआ, तो मैं तो मर ही जाऊंगी. मैं कमजोरी महसूस करने लगी थी और लड़खड़ाने भी लगी थी.</p>
<p>रवि भी पिछले बीस मिनट से एक ही आसान में संभोग करते हुए थकने लगा था. इस वजह उसमें जोश तो भरपूर दिख रहा था, मगर पहले की तरह वो ताकत नहीं लगा पा रहा था. रवि इस हाल में भी जबरदस्ती मुझे धक्के मारे जा रहा था.<br />
मैं धक्कों की वजह से इधर उधर लड़खड़ाते हुए गिरने जैसी हो रही थी. मेरे गले से रोने जैसी आवाजें निकलने लगी थीं, पर उन लोगों में से किसी ने दया जैसी चीज नहीं दिखाई. शायद वो जानते थे कि औरत हर तकलीफ झेल लेती है और शायद इसी वजह से मैं भी अपना उपयोग होने दे रही थी. </p>
<p>अब झुके झुके मेरी थकान इतनी अधिक हो गई थी कि कमर में दर्द होने लगा था और मेरी टांगें सुन्न सी होने लगी थीं. फिर अचानक मैं लड़खड़ाते हुए सोफे पर गिर पड़ी. मेरा भारी भरकम शरीर रवि नहीं संभाल पाया और मैं उसके चंगुल से निकल गई. सोफे पर गिरते ही मैं हांफते हुए ‘उणहहहहह..’ कर रही थी. </p>
<p>तभी रवि ने मुझे पकड़ कर जमीन पर सीधा पीठ के बल लिटा दिया और मेरी टांगें फैलाता हुआ बीच में आने लगा. मेरे पास अब उससे विनती करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. सो मैंने उससे कुछ देर सुस्ताने के नाम पर थोड़ा समय मांग लिया. मुझे इस बात की ख़ुशी हुई कि उसके भीतर इंसानों वाली थोड़ी बात तो थी. वो वैसे ही मेरे जांघों के बीच अपने घुटनों पर खड़े होकर लिंग हाथ से हिलाता हुआ इंतजार करने लगा. शायद वो भी थक चुका था, इसी वजह से उसने थोड़ी रहम दिखाई. </p>
<p>थोड़ी राहत मिलते ही उसने मुझसे पूछा और मैंने उसे आने को कहा. वो मेरे ऊपर झुक कर अपना लिंग मेरी योनि में घुसाते हुए पूरी तरह से मेरे ऊपर आ गया. उसने अपने घुटने को जांघों तक मोड़ लिया था और मैंने भी अपनी टांग उसकी जांघों पर चढ़ा दिया था. उसने धीरे धीरे से पूरा का पूरा लिंग मेरी योनि के भीतर घुसा दिया था और उसके सुपारे का स्पर्श मैं अपनी बच्चेदानी में महसूस करने लगी थी. उसने अपना पूरा शरीर मेरे ऊपर चढ़ा दिया था और हम दोनों के चेहरे एकदम आमने सामने थे. </p>
<p>मैंने उसके गले में हाथ डाल दिया और उसने मुझे कंधों से पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया. अब उसने अपनी कमर को आगे पीछे करना शुरू कर दिया. थोड़ा आराम के वजह से जब मैं अपनी योनि में लिंग का घर्षण महसूस करने लगी, तो अच्छा लगने लगा था.</p>
<p>रवि के धक्के आराम और धीमी गति के थे, जिससे मैं समझ गई थी कि थकान की वजह से जोश और उत्तेजना दोनों ही कम हो गए थे. पर इतना तो मेरे दिमाग में था कि शायद रवि काफी देर तक संभोग करने के बाद ही झड़ेगा.</p>
<p>उधर कमलनाथ पूरा संतुष्ट दिख रहा था और वो मदिरा का स्वाद लेने में मग्न था. दूसरी तरफ रमा, कांतिलाल और राजशेखर काम वासना की आग में जलते दिख रहे थे.</p>
<p>जैसे जैसे संभोग की क्रिया अपने चरम की ओर अग्रसर होती जा रही थी, वैसे वैसे हम दोनों को अब आनन्द की अनुभूति होने लगी थी. रवि अब केवल धक्के ही नहीं मार रहा था बल्कि धक्कों के साथ साथ मेरे शरीर के अंगों को सहलाकर, दबा और मसल कर उनका आनन्द ले रहा था. वहीं मेरी उत्तेजना भी इस तरह बढ़ चुकी थी कि उसकी हर हरकत का मैं खुले मन से स्वागत करने लगी और साथ ही सभोग में बराबर की भागीदारी देने लगी थी.</p>
<p>रवि के धक्कों में अब फिर से धीरे धीरे तीव्रता आने लगी और मुझसे भी जहां तक हो सकता था, वहां तक अपनी कमर उठा कर उसके लिंग को अपनी योनि में आने देती थी.</p>
<p>कोई 20 मिनट के करीब हो चुके थे और हम दोनों पसीने पसीने हो गए थे. उधर मेरी योनि से झाग सा बहता हुआ मुझे महसूस होने लगा था. दोनों अब एक दूसरे को पूरी ताकत के साथ पकड़ कर लंबी लंबी सांस ले रहे थे. हम दोनों हांफते हुए अपने अपने चूतड़ हिला हिला योनि में लिंग रगड़ते हुए आगे बढ़ने लगे. </p>
<p>मैं अब बहुत जल्द झड़ने वाली थी और ऐसा लग रहा था मानो रवि भी किसी पल पिचकारी छोड़ देगा. मेरी योनि बहुत चिपचिपी और गीली हो गई थी, जिसकी वजह से जब जब रवि लिंग बाहर कर अन्दर धकेलता, तो मेरी योनि से छप छप की आवाज आती.</p>
<p>कुछ पल और संभोग करते हुए रवि के धक्के दुगुनी तेज़ी से लगने लगे और उसने अचानक धक्के मारते हुए ही मुझे पकड़ कर करवट ले ली. उसने मुझे अपने ऊपर चढ़ा लिया. वो इस तरह से पलटा था कि उसका लिंग मेरी योनि से बाहर नहीं आया.</p>
<p>मैं भी बहुत गर्म थी, सो मुझे किसी तरह की परेशानी नहीं हुई और मैं बिना रुके धक्के लगाने लगी. रवि ने भी मेरे चूतड़ पकड़ नीचे से जोर लगाना शुरू कर दिए.</p>
<p>अब तो आनन्द दोगुनी बढ़ गई और चरम सुख ऐसा लगने लगा जैसे सामने ही है.</p>
<p>मेरे जांघों में कम्पकपी सी होने लगी और मैं रवि के सीने से चिपक कर अपने भारी भरकम चूतड़ ऊपर नीचे करते हुए धक्के देने लगी. मेरी नाभि से करंट सा निकलने लगा और मेरी योनि तक दौड़ लगाने लगा. मैं अब पूरे जोश में आ गई और मेरे भीतर ऐसा लगने लगा, जैसे ऊर्जा का भंडार फूट पड़ा हो. मैं तेज़ी से धक्के मारने लगी और रवि भी अपने चूतड़ तेज़ी से उछालने लगा. मैं समझ गई कि रवि भी झड़ने वाला है. </p>
<p>तभी मैं अचानक से चीख पड़ी- उम्म्ह … अहह … हय … ओह … माँ मर गई!</p>
<p>मैं झटके मारते हुए झड़ने लगी. मेरी योनि की मांसपेशियां अकड़ने लगीं और योनि की दीवारों से तेज़ तरल रिसने लगा. इधर जब तक मैंने 3 से 4 धक्के मारे थे, रवि भी मेरे चूतड़ और ज्यादा ताकत से पकड़ गुर्राने लगा और फिर एक तेज़ गर्म लावा सी मेरी योनि के बच्चेदानी से टकराया. </p>
<p>बस अब अंत नजदीक था. मैं जहां जहां धक्के मार उसे पकड़ चिपकी रही, वहीं वो तब तक गुर्राते हुए झटके मारता रहा. जब तक उसने अपनी वीर्य की थैली खाली न कर दी. मैं उसके वार झेलती हुई उसके ऊपर लेटी ढीली पड़ने लगी. उसने भी अपनी आखिरी बूंद छोड़ कर शांत लेटा रहा.</p>
<p>मैं अब महसूस करने लगी कि लिंग मेरी योनि के भीतर ढीला हो रहा है. जैसे जैसे लिंग सामान्य अवस्था में आता गया, वीर्य टिप टिप कर मेरी योनि से टपकने लगा. दोनों पूरी तरह सुस्ताने के बाद अलग हुए, तो एक दूसरे को देख ये लगा कि हमने काफी मेहनत की है.</p>
<p>हम दोनों पसीने में लथपथ थे और अलग होने के बाद भी हम लंबी लंबी सांस ले रहे थे. </p>
<p>मैं उठकर नंगी ही स्नानागार में चली गई और खुद को साफ करने लगी. पर जाते हुए समय मैंने देखा कि कांतिलाल और राजशेखर के चेहरे पर वासना की भूख थी. </p>
<p>खुद को साफ कर मैंने रमा से कहा- मैडम मेरे कपड़े तो दे दीजिए.<br />
उधर से जवाब आया- अरे आजा तौलिया लपेटकर … खेल अभी बाकी है.</p>
<p>यह सुन मेरे मन में ख्याल आया कि आज रमा मुझे मरवा के ही रहेगी, इसलिए एक बार सोचा कि सब कह दूँ.<br />
मैंने कहा- अब और नहीं होगा … मुझे घर भी जाना है, रात हो जाएगी तो परेशानी होगी.</p>
<p>रमा मेरे पास आई, तो मैंने उससे बोला कि सबको मेरी सच्चाई बता दे.<br />
पर वो जिद पर अड़ी थी कि कल सबको बताएगी. वो चाह रही थी कि एक बार कांतिलाल और राजशेखर भी मेरे साथ संभोग कर लें. </p>
<p>पर मैं बहुत थक गई थी, इसलिए मैं उससे विनती करने लगी कि अब और नहीं हो पाएगा. लेकिन वो जिद पर अड़ी थी.<br />
तब मैंने उससे कहा कि मैं खुद सबको बता देती हूं.</p>
<p>अब रमा मान गई और बोली कि खाना खाने के बाद सब अपने अपने कमरे में चले जाएंगे और वो आज राजशेखर के साथ सोएगी.</p>
<p>उसने मुझे कांतिलाल के साथ ही रहने को कहा और फिर मुझे एक नए तरह के कपड़े दे दिए.</p>
<p>रमा सबको खाने के लिए बोल बाहर चली गई और उसने मेरे लिए कमरे में ही व्यवस्था कर दी.</p>
<p>मैं रमा के दिए हुए वस्त्र पहन तैयार हो गई, हालांकि ऐसे कपड़े मैंने पहले कभी पहने नहीं थे, पर ये मुझ पर जंच रहे थे. नाइटी के ही जैसी, मगर छोटी सी थी. उसके ऊपर से पहनने का गाउन भी था. </p>
<p>मैं खाना खाकर आराम करने लगी और कब मेरी आंख लगी, पता ही नहीं चला. ठंडी हवा और गद्देदार बिस्तर बहुत ही आरामदायक था.</p>
<p>ठंड की वजह से बार बार पेशाब आने की बीमारी ने मुझे बैचैन कर दिया. नींद से जगने पर आधी नींद में ही मैं पेशाब करने चल पड़ी. पेशाब करके मेरी नींद पूरी तरह से खुल गई थी. जब मैंने वापस आकर देखा, तो मुझे सामने बिस्तर पर कांतिलाल जांघिये में मुस्कुराता हुआ दिखा.</p>
<p>जब मैंने समय देखा, तो एहसास हुआ कि मैं ज्यादा देर नहीं सो सकी थी. अभी 11 ही बज रहे थे. संभोग की संतुष्टि और थकान ने मुझे सुला दिया था … पर अब कांतिलाल के रूप में एक और पड़ाव मेरे सामने आ गया था.</p>
<p>उसके मुस्कुराने की वजह से मैंने भी मुस्कुराते हुए उसका उत्तर दिया. फिर उसने मुझे पास बैठने को कहा और फिर हम बातें करने लगे.<br />
उसने मेरे कामुक बदन की तारीफ करते हुए कहा- तुम पिछले बार से कहीं अधिक कामुक, सुंदर और खुली हुई लग रही हो.<br />
मैंने भी उसे उत्तर दिया- रमा ने ही मेरा सब कायाकल्प किया है … वरना मैं तो पहले की ही तरह हूँ.</p>
<p>फिर उसने मेरे किरदार की सराहना करनी शुरू कर दी और कहा कि उन तीनों को जरा भी शक नहीं हुआ और अगले दिन जब पता चलेगा, तो सब चकित रह जाएंगे.</p>
<p>हम दोनों करीब एक साल बाद मिले थे और बातें करते करते काफी खुल चुके थे. हालांकि उसने मेरे साथ पहले भी संभोग किया था, पर उस समय मैं इतना अधिक खुली हुई नहीं थी.</p>
<p>बातें करते हुए हम एक दूसरे के आमने सामने हो गए थे और मैं एक टांग मोड़कर बैठ गई. लेकिन मुझे जरा भी अंदेशा नहीं था कि ये वस्त्र एक तरफ से कमर के पास से नीचे तक कटा हुआ था और मैंने पैंटी भी नहीं पहनी थी.</p>
<p>सोने के कारण गाउन तो मैं पहले ही निकाल चुकी थी, जिसकी वजह से मेरे स्तनों का अधिकांश हिस्सा दिख रहा था. </p>
<p>कांतिलाल की नजर शुरू से ही मेरे स्तनों पर थी. जबकि कुछ देर पहले उसने मुझे न सिर्फ नंगी देखा था, बल्कि अपने मित्रों के साथ कामक्रीड़ा में संलग्न भी देखा था. </p>
<p>शायद वस्त्रों का एक अलग प्रभाव पड़ता है और इसी वजह से मर्द स्त्रियों को कामुक वस्त्र में देखना पसंद करते हैं.</p>
<p>मैंने ध्यान दिया कि कांतिलाल बात करते हुए बीच बीच में मेरी जांघों के पास देख रहा. मैंने जब अपने नीचे देखा, तो उस वस्त्र के कटे हुए हिस्से की वजह से मेरी एक टांग बिल्कुल नंगी दिख रही थी और एक तरफ से मेरी योनि के बाल भी दिख रहे थे.</p>
<p>मैं चाहा कि उन्हें चुपके से छुपा लूँ, पर कांतिलाल ने टोक दिया- क्यों छुपा रही हो सारिका जी, अब हम दोनों के बीच क्या शर्म और लज्जा … </p>
<p>पता नहीं हम दोनों के बीच पति पत्नी जैसे संबंध भी बन चुके थे, पर बाकी और मित्रों की तरह हम आज भी एक दूसरे का नाम लेने के साथ जी जरूर लगाते थे.</p>
<p>खैर … उसकी विनती करने के बाद भी मैं मुस्कुराते हुए अपनी योनि को छुपाने के प्रयास करती रही. कांतिलाल वैसे भी केवल जांघिये में था. उसके शौक की क्या बात करूं, जैसा उसका जांघिया था, वैसा तो आजकल के नौजवान भी नहीं पहनते.</p>
<p>उसकी जांघिया को देख कर एक पल के लिए कोई भी कह सकता था कि वो औरतों वाली पैंटी है या मर्द के लिए भी ऐसे चलती है. ये सच में पुरुषों का अधोवस्त्र ही था.</p>
<p>हम दोनों यूँ ही बातें करते हुए समय बिताने लगे और मैं बार बार अपनी योनि छुपाने के प्रयास करती रही. मैं इतना तो समझ गई थी कि कांतिलाल मेरा भोग किए बगैर सोएगा नहीं. फिर भी मैं जान बूझकर समय टाल रही थी कि नशे में वो सो जाएगा.</p>
<p>पर ये मेरी भूल थी, जिसके सिर पर किसी महिला के जिस्म का नशा चढ़ा हो, उसे और कोई नशा क्या चढ़ेगा.</p>
<p>धीरे धीरे कांतिलाल मेरे नजदीक आ गया और तकिए पर सिर रख बातें करने लगा. उसने अब मेरे बदन की तारीफ मुझे छू छू कर करना शुरू कर दिया. कभी मेरे बालों पर हाथ फेरते हुए उन्हें रेशम कहता, कभी बांहों पर हाथ फेर कहता कि आज ये कितनी मखमली लग रही है. कभी मेरी जांघों पर हाथ फेर कर कहता कि कितनी गोरी, चिकनी और गठीली जांघ हैं. </p>
<p>थोड़ी देर बाद उसने मुझे अपनी ओर खींच कर बगल में लिटा लिया और मेरे होंठों पर उंगलियां फेरने लगा. </p>
<p>मैं ना तो उसे हां कहना चाह रही थी … और न ही ना कर पा रही थी. मेरा किसी तरह का विरोध न पाकर, वो आगे बढ़ गया. वो मेरे गले में उंगलियां फेरते हुए मेरे स्तनों तक जाने लगा. </p>
<p>उसके हाथ मेरे स्तनों पर पड़ते ही मैंने झट से उसका हाथ पकड़ लिया और बोली- प्लीज और नहीं … मैं बहुत थक गई हूं.</p>
<p>पर कांतिलाल तो बहुत उत्तेजित लग रहा था. मुझे इस रूप में देख कर वो कहां मानने वाला था. उसने मुझसे कहा- कोई जल्दी नहीं है … हमारे पास बहुत समय है. कल कोई काम भी नहीं है. </p>
<p>यह बोलकर उसने मुझे कमर से पकड़ अपनी ओर खींचते हुए अपने सीने से मुझे लगा लिया. उसकी आंखों में कामवासना की आग दिखने लगी थी. </p>
<p>मेरी इस क्सक्सक्स कहानी पर आपके मेल आमंत्रित हैं.<br />
[email protected]<br />
क्सक्सक्स कहानी का अगला भाग: खेल वही भूमिका नयी-4</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
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		<title>खेल वही भूमिका नयी-2</title>
		<link>https://kahani18.com/indian-sex-stories/khel-vahi-bhumika-nayi-part-2/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Sep 2025 06:26:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Indian Sex Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Call Girl]]></category>
		<category><![CDATA[Hot Sex Stories]]></category>
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					<description><![CDATA[अभी तक इस सेक्स कहानी के पहले भाग खेल वही भूमिका नयी-1 में आपने पढ़ा कि मेरी सखी रमा ने मुझे एक नेता के सामने वेश्या बना कर पेश कर दिया. अब वो नेता मेरे साथ कमरे में एकांत में मजा करना चाहता था. अब आगे: मैं भीतर गई, तो नेताजी बिस्तर पर लेटे हुए <a title="खेल वही भूमिका नयी-2" class="read-more" href="https://kahani18.com/indian-sex-stories/khel-vahi-bhumika-nayi-part-2/" aria-label="Continue reading खेल वही भूमिका नयी-2">पूरी कहानी पढ़ें</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>अभी तक इस सेक्स कहानी के पहले भाग<br />
खेल वही भूमिका नयी-1<br />
में आपने पढ़ा कि मेरी सखी रमा ने मुझे एक नेता के सामने वेश्या बना कर पेश कर दिया. अब वो नेता मेरे साथ कमरे में एकांत में मजा करना चाहता था.<br />
अब आगे:</p>
<p>मैं भीतर गई, तो नेताजी बिस्तर पर लेटे हुए थे. मुझे आते देख बोले- आ जा, इधर बैठ बगल में. </p>
<p>मैं उसकी बेइज्जती भारी बातें दरकिनार करती हुई मुख पर बनावटी हँसी दिखाते हुए उसके बगल बैठ गई. </p>
<p>उसने मेरे हाथ से पैग लेते हुए बोला- मस्त है तू तो, कभी पहले नहीं दिखी, बाहर से आई है क्या?<br />
मैंने भी हां कहते हुए बोला- उत्तरप्रदेश से आई हूं.<br />
इतना सुनने के बाद वो अपने पजामे के ऊपर लिंग को हाथ से सहलाते हुए बोला- चल थोड़ा तैयार कर … बहुत दिन हो गए है मुझे.</p>
<p>मैंने मुस्कुराते हुए उसके पजामे का नाड़ा खोल कर उसके जांघिये को नीचे सरका दिया. उसका लिंग किसी मांस के लोथड़े सा बिल्कुल ढीला ढाला बेजान सा पड़ा था. नेता 60 साल से ऊपर का ही होगा, पर लिंग सामान्य मर्दों की ही तरह बालों से भरा पड़ा था.</p>
<p>मैंने उसके लिंग को हाथ से हिलाना डुलाना शुरू किया, तो थोड़ा थोड़ा सख्त होने लगा.</p>
<p>नेताजी लगभग आधा गिलास खाली करने के बाद बोले- मुँह से चूसती नहीं है क्या … थोड़ा मुँह तो लगा.</p>
<p>उसकी बात सुन अपने किरदार के हिसाब से हंसती हुई मैं उसके लिंग को मुँह में भर चूसने लगी. मुझे उस आदमी को ये भी जताना था कि ये सब मेरे लिए रोज का काम है. मैं उसके लिंग के सुपारे को खोल चूसने लगी और एक हाथ से उसके अण्डकोषों को दबाने ओर सहलाने लगी.</p>
<p>कुछ ही पलों में उसका लिंग सख्त हो गया और गिलास भी खाली हो गया.</p>
<p>फिर नेता गिलास बगल में रखते हुए बोला- चल अब चोदने दे, मस्त माल है तू … तो मजा देगी न अच्छे से?<br />
मैं भी बोली- हां साहब, आपके लिए ही तो आयी हूँ, ऐसा मजा दूंगी कि दोबारा किसी औरत को नहीं देखोगे. बताओ कैसे करोगे?<br />
उसने बोला- चल साड़ी खोलकर लेट जा, मुझे औरतें अपने नीचे अच्छी लगती हैं.</p>
<p>मैंने बिना ज्यादा सवाल किए अपनी साड़ी उठा दी, पैंटी उतार दी और पल्लू सीने से हटा कर टांगें फैला कर चित लेट गई. </p>
<p>नेताजी ने मेरे स्तनों को देखा और बोला- मस्त बड़े बड़े है … अपनी चुचियां दिखा तो जरा. </p>
<p>मेरे ब्लाउज का हुक आगे की तरफ का था, तो मैंने उन्हें खोल दिया. ब्लाउज खोलते ही मुझे भी थोड़ी राहत मिली क्योंकि ब्लाउज थोड़ा ज्यादा ही कसा हुआ था. </p>
<p>उसने दोनों हाथों से मेरे दोनों स्तनों को बेरहमी से मसलना शुरू कर दिया … तो मैं दर्द से कराह उठी ‘उम्म्ह … अहह … हय … ओह …’</p>
<p>फिर वो मेरी जांघों के बीच झुकने लगा और एक हाथ से अपना कुर्ता ऊपर करके लिंग पकड़ मेरी योनि की ओर ले जाने लगा.</p>
<p>मैंने बोला- साहब, कंडोम तो लगा लो.<br />
उसने सख्ती से मुझसे बोला- साली, अब तू मुझे बताएगी कि मुझे कैसे चोदना है … ऐसे ही पड़ी रह.</p>
<p>मैं उसकी इतनी लज्जित करने वाली भाषा सुन कर सन्न रह गई. मुझे बहुत बुरा लगने लगा, पर मैं अपनी भावनाएं दबाए मुस्कुराती रही.</p>
<p>उसने अपना लिंग जोर से एक बार आगे पीछे किया और फिर उसे मेरी योनि की छेद पर सटा कर आसन ले लिया. लिंग का सुपारा अब तक मेरी योनि में प्रवेश कर चुका था और अपना संतुलन बनाने के बाद उसने धक्का मारा. उसका लिंग मेरी योनि में आराम से चला गया.<br />
उसके लिंग में उतना कड़कपन नहीं था, जैसे आम मर्दों में होता है और न ही उसके धक्के में इतनी ताकत थी. मुझे कोई परेशानी भी नहीं हुई … क्योंकि पहले से मैंने क्रीम भी लगा रखा था और ये भी उतना तकलीफ देने लायक नहीं था.</p>
<p>वो अपनी ताकत के हिसाब से पूरा जोर देकर कमर आगे पीछे करके लिंग मेरी योनि में अन्दर बाहर करते हुए संभोग करने लगा. दो मिनट बाद बोला- मजा आ रहा यार … मस्त चुत है तेरी, ऐसी औरत को चोदने का मजा ही कुछ और होता है, कंडोम में थोड़े इतना मजा आता है और तू कंडोम लगाने को बोलती है.</p>
<p>उसकी बातें सुनती हुई मैं अपने किरदार में ही रमी रही और मुझे कुछ खास परेशानी नहीं हो रही थी. कोई 5 से 7 मिनट होने को थे कि नेता झटके खाने लगा और जोर जोर से गुर्राते हुए पूरी ताकत से धक्के मारने लगा.</p>
<p>भले वो अपनी पूरी ताकत लगा रहा था, मगर मुझे उसकी ताकत में दम नहीं दिख रहा था. बाकी उसके गुर्राने की आवाज बाहर कमरे तक तो जरूर जा रही होगी.</p>
<p>फिर उसने एक बार अंतिम धक्का मार दिया और हांफने लगा. वो लिंग मेरी योनि में फंसा कर घुटनों के बल खड़े होकर अपनी कमर में हाथ रख बोला- मजा आ गया.<br />
दो पल ऐसे ही घुटनों के बल खड़ा रहा और फिर बिस्तर पर गिर पड़ा और मुझे तौलिए से लिंग साफ करने को कहा.</p>
<p>मैंने उसका लिंग साफ किया, फिर अपनी योनि भी पौंछ ली. मैं अपनी साड़ी पहले की तरह पहन बैठ गई. जैसे कि मुझे उम्मीद थी, वैसा तो हुआ नहीं बल्कि जल्दी जान छूट गई. पर अभी और क्या होना था … उसके बारे में सोच कर मन विचलित था.</p>
<p>कुछ देर बाद वो उठा अपने कपड़े सही किए और मुझे अपनी एक बांह के बगल पकड़ बाहर निकल गया. रमा मेरी तरफ देखने लगी और उसके चेहरे पर चिंता थी.</p>
<p>पर मैंने नजरों से इशारा कर दिया कि सब ठीक रहा. तब उसके चेहरे पर सुकून की रेखाएं दिखने लगीं.</p>
<p>मुझे एक बगल बिठा कर नेता जी फिर से उनके साथ व्यापार की बातों में लग गए और मदिरा भी अब अधिक हो चली थी.</p>
<p>इस वजह अब वो जाने की सोचने लगा. रमा के पति को जब भरोसा हो गया कि अब उसका काम हो जाएगा. तो वो नेता जी को नीचे उनकी गाड़ी तक छोड़ने चले गए. साथ ही वो तीनों मर्द भी चले गए.</p>
<p>मुझे अकेले में पाते ही रमा मेरे काम की तारीफ करने लगी और वो इस बात से काफी खुश थी कि किसी को शक नहीं हुआ.</p>
<p>अब रमा ने कहा- अभी और अधिक मजा आने वाला है.</p>
<p>रमा की तारीफ सुन मैं पिछली बातें भूल चुकी थी और अब रमा के दिमाग में एक और बात आई.</p>
<p>उसने मुझे बताया कि वो 3 मर्द भी वही लोग हैं, जो नए साल के उत्सव के लिए आए हैं. पर उन्हें रमा ने ये नहीं बताया था कि जो सारिका धनबाद से आने वाली थी, वो मैं ही हूँ.</p>
<p>मैं उसकी बात को कुछ समझी नहीं. तब उसने मुझे समझाना शुरू किया. रमा चाहती थी कि आज की रात उन 3 मर्दों को बिल्कुल न पता चले कि मैं कोई वेश्या नहीं, बल्कि वो मुझे वेश्या ही समझें और जब अगले दिन उन सबकी पत्नियां आएंगी, तब वो इस बात का खुलासा करेगी.</p>
<p>पर मैंने जब पूछा कि अगर कांतिलाल ने बता दिया होगा.<br />
इस पर उसने बताया कि मैं कांतिलाल को पहले ही समझा चुकी हूँ.<br />
शायद इसी वजह से मुझे देख कांतिलाल बिल्कुल भी चकित नहीं हुआ था. </p>
<p>रमा अब ये मौहाल बने रहने देने के लिए मुझे जोर देने लगी. जब मैंने उससे कहा कि अगर वो लोग मेरे साथ संभोग करने चाहेंगे, तब क्या होगा?<br />
उसने बोला- कोई बात नहीं वैसे भी हम सब यहां मजे करने आए हैं और संभोग हम सबके बीच सामान्य बात है. किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होगी. चाहे जिसके साथ कोई भी संभोग करे.<br />
मेरे लिए ये सब बहुत अनोखा था, पर रमा के जिद के आगे मुझे झुकना ही पड़ा.</p>
<p>उसने मुझे सिखा दिया कि कैसे किसी मर्द के साथ अधिकांश उच्च वेश्याएं मोल भाव करती हैं. मोल भाव के अंतर्गत वेश्याएं क्या क्या करेंगी और क्या क्या करने देंगी. ये सब तय होता है.</p>
<p>उसकी बातों से ये तो ज्ञात हुआ कि रमा पहले भी किसी वेश्या की मदद ले चुकी होगी. इसी वजह से मैंने उससे पूछ भी लिया.<br />
तब उसने बताया कि उनके व्यापार में कभी कभी ऐसा भी करना पड़ता है, जहां अच्छे खासे उच्च वर्ग की वेश्याओं का सहारा लेना पड़ता है. इसी वजह से वो खुद कई बार वेश्याओं से मिल मोल भाव कर चुकी है. उसने ये भी बताया कि शुरुआती समय में इस तरह के वातावरण में आने से पहले उन्होंने मजे के लिए पुरुष तथा महिला वेश्याओं का सहारा भी लिया था.</p>
<p>उसने पहली बार खुलासा किया कि उसने और कांतिलाल शुरुआत में कभी दो मर्द और कभी 2 औरत वाली संभोग क्रिया करते थे. पहले वो किसी को जानते नहीं थे, इसी वजह से वेश्याओं का सहारा लेते थे. पर अब उनके कई सारे देसी और विदेशी मित्र हैं, जो इस तरह की जीवन शैली पसंद करते हैं.</p>
<p>हमारी बातें अभी खत्म भी नहीं हुई थीं कि 4 मर्द कमरे में आ गए और हम चुप हो गए. उन चारों ने फिर से मदिरा पीनी शुरू की और अपनी अपनी पत्नियों के अगले दिन आने की बात कही.</p>
<p>इसी बीच मुझे उनके नाम पता चले और वे कहां कहां से आए थे ये भी मालूम हुआ. </p>
<p>मैं आपको रमा और कांतिलाल के बारे में बता चुकी हूं. अब बाकियों के बारे में बता दूं. </p>
<p>पहला आदमी रवि था, जो दिल्ली से था, दूसरा राजशेखर, जो गुजरात से और तीसरा कमलनाथ, जो मुम्बई से आया था. सभी के बात व्यवहार और कपड़ों के पहनावे से लग रहा था कि वे सब काफी उच्च घराने से थे और काफी अमीर थे.</p>
<p>उन्होंने अब कल की योजनाओं के बारे में बात करनी शुरू की. </p>
<p>फिर कमलनाथ ने रमा से पूछा- भाभी जी आज तो आपने कमाल कर दिया, ऐसी कामुक महिला आपको कहां से मिली?<br />
तभी रवि बोला- भाभीजी आपकी कोई सहेली आने वाली थी … उसका क्या हुआ?<br />
रमा ने उत्तर दिया- कल वो भी यहीं आ जाएगी.</p>
<p>तभी राजशेखर ने कहा- यार कांतिलाल, तुम तो रोज भाभीजी के साथ मजे करते हो … अगर बुरा न मानो तो आज भाभी जी को मैं अपने बिस्तर पर न्यौता देना चाहता हूँ.<br />
इस पर कांतिलाल ने कहा- भाई देखो रमा और मुझमें कोई ऊंचा नीचा नहीं है, अगर रमा को अच्छा लगे, तो साथ समय बिताने में क्या बुराई है.<br />
उधर कमलनाथ ने कहा- यार, आज की रात तो मैं भाभीजी को न्यौता देने वाला था, पर तूने पहले बोल दिया.<br />
इस पर रमा बोली- सबकी बातों को बराबर ध्यान दिया जाएगा, पर आज जिसने पहले न्यौता दिया, पहला हक़ उसका बनता है.</p>
<p>ये कहते हुए रमा सोफे से उठकर राजशेखर के पास बैठ गई और दोनों एक दूसरे के होंठों से होंठ मिला कर चूमने लगे. इसके बाद सब हंसने लगे.</p>
<p>इधर कमलनाथ और रवि की नजर मुझ पर पड़ी, तो उन्होंने कहा कि आज की रात हम तुम्हारे साथ बिताएंगे. </p>
<p>अब यहां से मुझे खेल शुरू करना था और रमा ने मुझे सिखा दिया था कि अब क्या क्या करना है.</p>
<p>जैसे ही कमलनाथ मेरे पास आकर बैठा. तो सबसे पहले तो उसने मेरी पल्लू गिरा दिया.<br />
पर मैंने वापस पल्लू ऊपर किया और बोली- कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता साहब.<br />
इस पर कमलनाथ ने कहा- पैसे तो रमा ने दे दिए थे न तुझे.<br />
मैंने बोला- एक का मिला था और इतने मर्दों के बारे में मुझे नहीं बोला था.<br />
कमलनाथ बोला- अच्छा ठीक है … पैसे ले लेना, कितने लेगी बोल?<br />
मैंने रमा के सिखाए अंदाज में बोला- एक शॉट का 5000, बिना कंडोम 7000 और चूसने का 1000 अलग से लगेगा. </p>
<p>मेरी बातें सुन कर रमा भी एक तरह से बहुत खुश थी, मगर वो अपनी ख़ुशी बाहर नहीं दिखने दे रही थी.</p>
<p>रवि और कमलनाथ ने बोला- ये तो बहुत ज्यादा है … कुछ कम करो.<br />
मैंने बोला- मुझे अब जाना है और ज्यादा रात हो गई, तो मैं जा भी नहीं पाऊंगी, करना है, तो बोलो.</p>
<p>तब दोनों मान गए. उधर कांतिलाल भी मन ही मन मेरा नाटक देख मुस्कुरा रहा था.<br />
कमलनाथ ने तुरंत अपने बैग से 8000 निकाले और कहा- हां चल ये ले.</p>
<p>फिर रमा से कमलनाथ ने कहा- भाभीजी, आपको कोई परेशानी नहीं तो क्या मैं इसे यहीं चोद सकता हूँ?<br />
रमा यही तो चाहती थी. वो झट से बोली- प्लीज आप लोग मुझे भाभी कहना बन्द कीजिये … केवल रमा कहिए … और किसे कहां चोदना है, मुझसे ना पूछें, मैं भी तो देखना चाहती हूँ कि आखिर ये कैसी सर्विस देती है.</p>
<p>कमलनाथ ने मुझे उठा कर पहले तो खड़ा किया. फिर बड़े ही इत्मीनान से मेरे पूरे बदन को लिपट लिपट कर मुझे टटोला. फिर मेरे आगे खड़े होकर उसने मेरा पल्लू हटा दिया. मेरे स्तनों को दबाने लगा और मसलते हुए मेरा ब्लाउज खोल दिया. </p>
<p>मेरे स्तन अब खुल के आजाद हो गए. उसने बारी बारी से मेरे स्तनों को मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिया.<br />
वो बोला- वाह रमा भाभी, ये तो दुधारू गाय है.</p>
<p>ये सुन रमा हंसने लगी और रवि और कान्तिलाल भी खुश हो गए. कमलनाथ मेरा दूध चूस चूस कर पीने लगा. </p>
<p>फिर थोड़ी देर के बाद उसने अपना पेंट खोल दिया और लिंग बाहर निकाल मुझे चूसने को कहा. मैं उसके आदेश के अनुसार नीचे घुटनों के बल हो गई और उसके लिंग को देखते हुए उसे हाथों में लेकर हिलाने लगी. उसका लिंग सच में बहुत मस्त आकार में था और लंबाई और मोटाई एकदम सही थी. उसका लिंग किसी भी स्त्री को चरम सीमा तक पहुंचाने के लिए बड़ा मजबूत दिख रहा था. </p>
<p>अभी से ही उसके लिंग ने हल्के हल्के से सख्त होना शुरू कर दिया था. थोड़ा और हिलाने से वो और थोड़ा सख्त हुआ और फिर मैंने उसके सुपारे को खोल उसके सुपारे पर अपनी जुबान फिरानी शुरू कर दी. उसे वाकयी बहुत आनन्द आने लगा और उसके चेहरे पर वासना की आग बढ़ती हुई दिखने लगी.</p>
<p>थोड़ी देर और चूसते हुए उसका लिंग अब पूरी तरह से कड़क हो गया. मैंने उसे पूरा मुँह में भर उसे चूसते हुए जीभ से सुपारे को भी सहलाने लगी. </p>
<p>मैंने अपने किरदार के मुताबिक उसे खुश करने का प्रयत्न करना शुरू कर दिया था. मैंने पूरी तरह से उसके लिंग को थूक में डुबाकर गीला कर दिया था. उसके अण्डकोषों में नसें सिकुड़ और फूलने लगी थीं. ऐसा लग रहा था, मानो जैसे अभी ये पिचाकरी छोड़ देगा. इसी वजह से मैं थोड़ा सतर्क होकर उसके लिंग को चूस रही थी ताकि कहीं अगर वो वीर्य छोड़े, तो मेरे मुँह में न चला जाए.</p>
<p>मुझे उस व्यक्ति के बारे में कोई ज्ञान नहीं था. इस वजह से और अधिक सतर्क रहना जरूरी था.</p>
<p>तभी उसने बोला- अब चल सोफे पे बैठ.<br />
मैं सोफे की तरफ गई … तो रमा बोली- अरे साड़ी वाड़ी तो उतार ही दे तू … अभी और ग्राहक दे रही हूँ आज तुझे. </p>
<p>मैंने भी ‘जी मैडम..’ कह कर अपनी साड़ी खोल दी. कमलनाथ भी मुझे नंगा करने में मदद करते हुए मेरी पेटीकोट का नाड़ा खोलते हुए मेरी पैंटी निकालने लगा.<br />
वो बोला- बहुत फैंसी पैंटी पहनती है तू तो … और तेरी गांड कितनी मस्त है.<br />
मैं मुस्कुराती हुई सोफे पर चित लेट गई और अपनी एक टांग को सोफे के नीचे झुला दिया.</p>
<p>कमलनाथ भी सोफे पे मेरे सामने आ गया और अपनी कमीज निकाल कर मेरी जांघों के बीच चला आया. उसका लिंग फुंफकार मार रहा था. एक सामान्य मर्द के हिसाब से उसके लिंग का आकार बहुत सही था. मोटाई और लंबाई भी काफी अच्छी थी. काले काले बालों से घिरा हुआ लिंग था.</p>
<p>वो मेरे ऊपर झुकते हुए अपने लिंग को पकड़ मेरी योनि की दिशा में ले जाने लगा. योनि तक लिंग पहुंचते ही उसने लिंग का सुपारा मेरी योनि की छेद में टिका दिया. अब वो अपने दोनों हाथ मेरे सिरहाने रख कर संभोग के आसन में आ गया. उसने अच्छे से जगह बनाने के बाद धीरे धीरे लिंग मेरी योनि में धकेलना शुरू किया. कुछ हल्के फुल्के धक्कों में उसका लिंग मेरी योनि में सरकते हुए मेरी योनि के भीतर जाने लगा. </p>
<p>मुझे उसके लिंग के आकार से आनन्द सा महसूस होने लगा. उधर सभी लोग हमारी तरफ ही देख रहे थे और उनके भीतर भी मस्ती भरी वासना जागृत होने लगी थी.</p>
<p>मैंने ध्यान दिया तो कांतिलाल, रवि और राजशेखर तीनों बीच बीच में मदिरा पीते हुए अपने अपने लिंग पर हाथ फेर रहे थे. उसने हाथ पैंट के ऊपर से ऐसे लग रहे थे, मानो वे अपने कड़क होते लिंग को अपनी अपनी जांघियों के भीतर ठीक कर रहे हों.</p>
<p>इधर कमलनाथ ने मुझे धक्के मारने शुरू कर दिए. धीरे धीरे मुझे अच्छा लग रहा था कि ये आदमी अपनी कुशलता के अनुसार किसी प्रकार की हड़बड़ी में नहीं था … बल्कि मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मेरे बदन का आनन्द लेने के साथ मुझे भी तृप्त करना चाहता है.</p>
<p>वो धक्के मारते हुए मेरी आंखों में देखने लगा और मैं कभी उसकी नजरों से नजर मिला लेती, तो कभी उन पांचों की तरफ देखने लगती.</p>
<p>कोई 5 मिनट होते होते तो अब मेरी योनि के भीतर भी रस रिसने लगा और मेरी योनि गीली होने लगी. अब मुझे आनन्द आने लगा था और मैं उसे कभी पकड़ कर, कभी अपने चूतड़ उठा कर मजे आने के संकेत देने लगी थी. मैं कराहने भी लगी थी.</p>
<p>दस मिनट होते होते तो कमलनाथ चरम पर पहुंचने की स्थिति में आने लगा था. अब उसके आव भाव भी बता रहे थे कि उसे बहुत आनन्द आ रहा था. उसकी संभोग की कला से इतना तो मुझे अंदाज लग चुका था कि ये बहुत अनुभवी है और जल्दी नहीं झड़ेगा. उसकी संभोग क्रिया की तकनीक और चेहरे के आव भाव से लग रहा था कि उसे बहुत ज्यादा आनन्द आ रहा था. मुझे धक्के देने में साथ ही ऐसा लग रहा था मानो वो स्वयं को जल्द पतन होने से रोक रहा था. </p>
<p>मैं अब अपने भीतर काम वासना की आग में जलन महसूस करने लगी थी. मुझे इस तरह वेश्या का किरदार करने से खुद निर्लज्ज स्त्री की भांति जिज्ञासा जागने लगी थी. मैं बोल तो नहीं पा रही थी, पर मेरी सिसकियों, कराहों और हाथों पैरों की छटपटाहट से शायद उसे भी अब अन्दाज हो गया था कि मुझे आनन्द आ रहा था.</p>
<p>जहां इतनी देर जांघें फैलाये हुए अब मुझे मेरी जांघों में अकड़न होने लगी थी … वहीं कमलनाथ भी धक्के मारते हुए थकान महसूस करने लगा था. पर मैं कुछ नहीं बोल सकती थी क्योंकि मेरे किरदार के हिसाब से मालिक कमलनाथ था और मुझे हर कष्ट बर्दाश्त करना था. क्योंकि उसने पैसे चुकाए थे.</p>
<p>कमलनाथ कोई नौजवान तो था नहीं कि इतनी देर तक धक्के मार सके … हालांकि वो इतना अनुभवी तो था कि संभोग को लंबे समय तक खींच सके.</p>
<p>उधर रमा और राजशेखर भी उत्तेजित होते दिख रहे थे. राजशेखर ने रमा के ब्लाउज के ऊपर से उसके स्तनों को दबाना शुरू कर दिया था. वहीं रमा भी उसके पैंट के ऊपर से उसके लिंग को टटोल रही थी.</p>
<p>बाकी कांतिलाल और रवि का तो जैसे सब्र का बांध टूटने को था. कमलनाथ धक्के मारते हुए थक चुका था, सो उसने मुझे आसान बदलने को कहा. वो सोफे पर बैठ गया … अपनी टांगें जमीन पर रख कर और मुझे अपनी गोद में बैठने को बोला.</p>
<p>मेरी इस सेक्स कहानी पर आपके मेल आमंत्रित हैं.<br />
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<p>कहानी का अगला भाग: खेल वही भूमिका नयी-3</p>
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